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Tuesday, 26 April 2011

ये बादल हमें सिखाते हैं

ये बादल हमें सिखाते हैं ...
दो बादल  हैं बौराए से 
टकरा टकराकर वो गरज़ते हैं 

कुछ  अमृत वो छुपाये थे 
जो बूंदे बन बरसते हैं 

बच्चे हैं कुछ  अलसाए से 
घर से वो अब   निकलते हैं 

अर्धनिद्रा में कुछ सोये  थे 
वो बादल  को धिक्कारते हैं 

धान को रोपे कुछ रोये थे 
वो   ईश -कृपा  स्वीकारते  है 

दो ध्रुव जब साथ  निभाते हैं 
तो जलने वाले जलते हैं 

विकास  रुपी वर्षा लाते हैं 
बस लड़ने से क्या होगा 

ये बादल हमें सिखाते हैं 
स्वार्थ करने  से क्या होगा 

वर्षा लाते हैं हम मिलकर 
सपने बुनने  से क्या होगा 

वर्षा लाते हैं हम मिलकर 
सपने बुनने  से क्या होगा 








..

तू बस याद रखना इसे भूलना नहीं

तू बस याद रखना इसे ....... भूलना नहीं


वो कहते हैं न की कल पीछा नहीं छोडती 
तो वो कल ही थी 
जिसे  निशांत   भूल कर आ गया था 
ज़माने के दस्तूर जो थे 
और उसके  घर के संस्कार 

किसी ने याद दिला दिया 
और फिर वो आज बन गयी 
वो जीने लगा 
और मरने लगा उसका वजूद 
या फिर बदलने लगा 
उस ईश की कृपा से 


जीने लगा वो 
हर पन्ने  में एक रंग भरने लगा 
मन की सुनने लगा 
और सबके मन को अपना सा 
समझ भूल गया आने वाले कल को 
उस ईश को उसके बल को 


पर लोगों ने अपने अनुभव सुनाये 
वो तो अपने मन की सुना 
और क्या था जो उसका था 
उसने उसे माना  ही था अप्राप्य 
पर वो प्राप्त हुई 
एक शक्ति जो उसे पहचान दिलाती रही 
कभी धुप में कभी छाओं में 
आज उस शक्ति को ढूंढ़ता है 
वो कहती है तू भूल गया था कुछ
जा उसे ढूंढ 
जा माँ के पास बैठ 
वो तुझे अपना लेगी 

तू हारा हुआ है 
तो भी तेरे सपनो में एक 
शक्ति को वो डाल देगी 
और फिर भी न ढूंढ पाया उस शक्ति को

तो उस दिन को याद कर जब 
तू इसी तरह बैठा था निस्तेज 
और वो एक प्रकाश के तरह आई थी 
तू बस याद रखना इसे 
भूलना नहीं 

मेरा चन्द्रमा तो विलक्षण है

मेरा चन्द्रमा तो विलक्षण है
वो  चकोर है 
तकता है रस्ता चाँद का 
जो ना आ पाएगी कभी मिलने 
फिर भी आवाज़ लगाता है 

बादल उसे समझाते हैं 
उसके रूठे मन को बहलाते हैं 
वो है परियों के शहर की 
तू व्यर्थ का शोर मचाता है 

उसने चाँद को बोल दिया
तेरे लिए दुआएं भेजी थी 
नज़र न लग जाए तुझको 
ये बादल जो तुझे बचाता है 

टिमटिमाते हैं तारे 
अमावस की रात में 
चकोर फिर भी उदास है 
वो चाँद नज़र नहीं आता है 

उसने तारों को बोल दिया 
तू आभूषण मात्र है आकाश का   
मेरा  चन्द्रमा तो विलक्षण है 
जो जग को शीतलता पहुंचाता   है 


..

आज तू वो कलम उठा

आज तू वो कलम उठा ......

एक था निशांत | हर बात में आ जाता था अपने ज़ज्बातों को लेकर पर अल्हड था थोडा 
उसे विजय ने बहुत समझाया ,तू ज़ज्बात में मत बह | ऐसा नहीं होता है रे !
तू धीर बन |यहाँ तेरे ज़ज्बातों से उथल पुथल मच जायेगी | धीर बन और बदले में
आने वाले ज़ज्बातों को समझा कर रे !| विजय से उसने बहुत सिखा | धीर तो वो रखने लगा
फिर भी ज़ज्बात में बहने लगा 
बहुत दूर जाकर जब उसे हार मिली |  ज़ज्बातों को न समझने की सजा मिली |
तो उसे बहुत याद आई अपने दोस्त विजय की | आज विजय एक प्रकाशक है |
और निशांत आया है उससे सहारा मांगने |  उसे अपनी गलती पर  पछतावा हो रहा था |


विजय  से  कुछ  बोलने  की   हिम्मत  उसे  नहीं  हो  रही   था | वो उसकी बातों को अनसुना कर 
चला गया था एक दिन |हुआ यूँ था की निशांत अकेले उठ खड़ा हुआ बिना सोचे विचारे जब उसके और उसके साथियों पर झूठे आरोप लगे थे चोरी के |विजय ने उसे  बस इतना कहा  की हमेशा सच नहीं बोलना चाहिए  | पर निशांत ज़ज्बात के मद में विवेक को भूल गया था | जब विजय ने उसे बोला की तुम अपने ज़ज्बातों को क्यों नहीं संभाल के रखते तो उसे इस बात की सारगर्भिता रास नहीं आई वो समझा की विजय उसका मजाक उड़ा रहा है |   
पर विजय उसके उथल पुथल को समझ रहा था | उसने उसे बोला निशांत  कैसे हो?


निशांत  सकुचाते हुए बोला तुमने मुझे पहचान लिया |विजय ने बोला दोस्त था तू मेरा ,तेरे साथ मैंने कितनी महफिले बितायी थी | निशांत रोने लगा , तो उसको सहारा देते हुए विजय ने बोला -अरे हिम्मत रख यार ..अभी हार जाएगा |
विजय ने बोला तू कवि बन सकता है |तुझमे ज़ज्बात हैं पर तू थोडा सा संयम   रख |  
अपने मन को थोडा एकाग्र कर ले | निशांत ने बोला कहाँ मैं कवि बन सकता हूँ |
मुझे तो शब्दों पर भी पकड़ नहीं है| 

तब निशांत को एक कागज़ देते हुए विजय ने बोला | देख ये तेरे घर से आया है |
तुने कुछ पन्ने भरे थे |देख ले इसे | बहुत पुराने हो गए हैं पर तेरे ही हैं|
मैं तेरी लिखावट आज भी पहचान सकता हूँ |  तुने तब कुछ  शब्दों को लिख दिया था |
याद है न जब हम और तुम और सुजीत जाते थे चाय वाले के ढाबे पर तो तुने चाय मेरे शर्ट पर गिरा दी थी और फिर मुझसे जिद करने लगा था की मुझे ये शर्ट चाहिए मैंने वो शर्ट तुझे दे दिया 
और तुने तब उसे धोकर मेरे जन्मदिन पर वापस किया था |
और साथ में एक कागज़ भी था जिसपरदोस्ती पर तुने ऐसे ही कोई कविता लिख दी थी 
हम लोग खूब हँसे थे तुम्हारी इस मुर्खता पर पर बाद में बड़ा अच्छा लगा था |
तुम्हारे अन्दर के कवि को मैं पहचान गया था | मैंने वो कविता माँ जी को दे दी थी |
वो बहुत खुश हुई थी तब  | आज तू वो कलम उठा और अपने घर के 
सपने को पूरा कर निशांत 
तू कर सकता है 
विजय तेरे साथ है  ..

अब इंतज़ार नहीं करेगी माँ

अब इंतज़ार नहीं करेगी माँ

 एक कविता माँ के लिए 
अब इंतज़ार नहीं करेगी माँ 
...................................................................................
अब इंतज़ार नहीं करेगी माँ ..
सपनो से ही सही 
ये यथार्थ होगा 
चिराग जो जला है अन्यास
वो कल स्वयं ही चरितार्थ होगा 



जब मैं नहीं था तो सपने भी
उसने ही बनायीं थी 



सपनो के साथ आज हूँ चला 
शब्द के ढालों से हूँ ढला 
इस रण में जो कुदरत खेलेगी मुझसे 
अपने सपनो के कटार  और शब्दों के ढाल 
से उससे मुकाबला मैं कर लूँगा 
हार भी गया तो 
एक निशान  छोड़ चलूँगा कुछ पन्नो पर 
कुदरत मुस्कराएगी देख कर मेरी हार 
और मेरी माँ मुस्कराएगी देख कर मेरी जीत  

अब इंतज़ार नहीं करेगी माँ

वक़्त ने ललकारा है फिर कलम धरो ..

वक़्त ने ललकारा है फिर कलम धरो
एक सपना था 
आया  अन्यास 

वो प्रभु का प्रताप था 
उसने समझा यथार्थ  था 

पर वो  कल का उसके 
परमार्थ था 

भटका था कुछ दूर 
राह में अनजानी 
कुछ तस्वीर थी 

बेगानों की महफ़िल 
या दिलवालों की भीड़ थी 

जीवन पथ में
साक्षी बनाया उस स्वप्न 
के अंजानो को 

जीवनसाथी है कलम 
उस सत्य के प्रमाणों को  

भीड़ से एक आवाज़ मिली 
कुछ शब्द मिले ,एक आवाज़ मिली 

चला अकेला ही था  वो 
वो कलम का एक सिपाही था 

प्रेमचंद या हो दिनकर 
वो शब्द-क्रांति का एक प्रहरी था 

विपत्ति  आती है जब जब 
जीवन मद्धम हो जाता है 

कलमकार शब्दों से लड़ता 
हर युद्ध जीतता जाता है 

सोये जनमानस को भी 
एक राह वही दिखलाता है 

जागृति लाता है 
और युग बदल जाता है 


ओर्विन्दो ,दिनकर ,सुब्रमण्यम के 
शब्दों ने बिगुल विप्लव की  बजायी  थी 

बिस्मिल   ने भी शब्दों से ही 
वर्तानियों    की   नींद    उडाई    थी 

वक़्त ने ललकारा है फिर  कलम धरो   
 नौजवानों   भ्रटाचार    से जूझ   पड़ो   

कवि तारणहारा होता है

विषैले शब्द रक्त में दिन प्रतिदिन उनके धमनियों में बहते हैं


जगत के दावानल में 
सर्प सम विपत्ति से डसे   हुए 
कुछ मरे हुए ,कुछ डरे हुए 
ये मानवों के संतापो को हरते हैं  
विषैले शब्द रक्त में 
दिन प्रतिदिन 
उनके धमनियों में बहते हैं 

एक अमृत  कलश है  ये  विष 
व्याप्त  मन मंदिर में उनके रहता है 
करता है निस्तेज असत को 
जब मंथन वो मन का करते हैं 
नव जीवन देता है मानव को 
जब  सपने उसके क्षीण भिन्न   होते हैं 
यथार्थ के कटारों से 
वो घायल परे जब होते हैं 

सपेरा है काल्पनिक मन 
वो शब्दों  को वश में करता है 
मरे हुए मानव मन का 
संचार वो सपेरा करता है 
निर्बलों के संतप्त मन का 
वो विषैला रक्त ही सहारा होता है 
अमृत रचता है उस विष से 
कवि तारणहारा  होता है 



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